Saturday, July 5, 2008

आदर्श प्रश्न पत्र

2-आदर्श प्रश्न पत्र

कक्षा  10

विषय  हिन्दी पाठ्यक्रम 'अ'

समय :  3 घण्टे                                                                               अधिकतम अंक :  100

खण्ड -क

प्र.1 निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

वर्षा ॠतु का नाम आते ही मन–मयूर नाच उठता है। भयंकर गर्मी से राहत मिलती है। ठंडी फुहारों से स्वर्गिक आनन्द की अनुभूति होती है। सभी ॠतुओं में मनमोहन वर्षा ॠतु है। गर्मी की तपन के बाद वर्षा की फुहारों का आगमन बड़ा आनंददायी होता है। पशु–पक्षी और मानव ही नहीं, पेड़–पौधों पर इस ॠतु का प्रभाव पड़ता है। ऐसा लगता है मानो वीरान व बंजर जमीन पर रंग बिरंगे फूल खिल उठे हों।

वैशाख और ज्येष्ठ मास की भयंकर तपन के बाद आषाढ़ मास में मोरों की कूक से अहसास होता है कि बरसात की ॠतु आने वाली है। तब तक गर्मी से मन व्यथित हो चुका होता है। वर्षा शुरू होते ही खेत–खलिहानों में हरियाली शुरू हो जाती है। लोग धान की बुआई–रोपाई में व्यस्त हो जाते हैं। मोर जी भरकर नृत्य करते हैं। कोयल की कूक बड़ी सुहानी लगती है। बच्चे उत्साह से भर जाते हैं नंगे बदल वर्षा में भीगते हुए इधर–उधर भागना बड़ा अच्छा लगता है।

अच्छी बरसात हो तो नर–नारियाँ खुशी से झूम उठते हैं। खेतों में लबालब भरे पानी में धान की बुवाई, खेतों की जुताई। किसानों का मन मुदित हो उठता है। ऐसा लगता है कि सारी प्रकृति एक नए अवतार में प्रकट हुई है। सब कुछ वर्षा में घुलकर नया–नया सा लगता है। अच्छी बरसात में धरती में पानी का स्तर बढ़ जाता है। सूखे कुएँ दोबारा पानी से भर जाते हैं, तालाबों और जोहड़ों में बत्तख और पशु नहाते नज़र आते हैं?

एक तरफ वर्षा ॠतु प्रसन्नतादायी अनुभूति देती है। दूसरी तरफ इस ॠतु में कुछ समस्याएँ खड़ी हो जाती हैं। महानगरों में सीवर जाम हो जाते हैं, जिसके कारण सड़कों पर नदी का सा दृश्य दिखाई देता है। यातायात–व्यवस्था चौपट हो जाती है। नदियों में बाढ़ आ जाती है। जिससे गाँव बर्बाद हो जाते हैं। जान–माल की बहुत हानि होती है। रास्ते बन्द हो जाते हैं अत्यंत परेशानी पैदा होतीहै। गरीबों पर तो वर्षा कहर बनकर आती है। जीवन नारकीय हो जाता है। चारों तरफ कीचड़ ही कीचड़। मकानों की छतें गिर जाती हैं। झोंपडि़यों की हालत ऐसी हो जाती है मानों वषो से वीरान पड़ी हों।

वर्षा ॠतु के जाने के बाद भी हालत सहज नहीं हो पाती। एक अजीब –सी बदबू चारों तरफ फैल जाती है। मच्छरों की भरमार हो जाती है। इस प्रकार वर्षा ॠतु खुशियों के साथ गमों का साया भी लेकर आती है।

क.लिखे गए गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए। 1

ख.मन–मयूर क्यों नाच उठता है? 2

ग.वर्षा ॠतु किन–किन महीनों में आती है ? 2

घ.'मन मुदित हो उठना' से क्या तात्पर्य है ? 2

ङ.वर्षा के बाद प्रति का नया रूप कैसे प्रकट होता है ? 2

च.'गमों का साया' से क्या तात्पर्य है? 2

छ.'मन–मयूर' का विग्रह करके समास का नाम लिखिए। 1

प्र.2 -निम्नलिखित काव्यांश को पढ़कर सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर लिखिए –

मैंने देखा –

एक बड़ा बरगद का पेड़ खड़ा है

उसके नीचे कुछ छोटे–छोटे पौधे

बड़े सुशील, विनम्र

देखकर मुझको यों बोले –

हम भी कितने खुशकिस्मत हैं

जो खतरों का नहीं सामना करते।

आसमान से पानी बरसे

आगी बरसे

आँधी गरजे

हमको कोई फिक्र नहीं है

एक बड़े की वरद छत्र–छाया के नीचे

हम अपने दिन बिता रहे हैं।

बड़े सुखी हैं

मैंने देखा –

एक बड़ा बरगद का पेड़ खड़ा है

उसके नीचे

कुछ छोटे–छोटे पौधे

असन्तुष्ट और रुष्ट

देखकर मुझको यों बोले –

हम भी कितने बदकिस्मत हैं

जो खतरों का नहीं सामना करते

वे कैसे ऊपर को बढ़ सकते हैं।

इसी बड़े की छाया ने ही

हमको बौना बना रखा

हम बड़े दुखी हैं।

 

क.इस कविता में बरगद तथा छोटे पौधे किसके प्रतीक हैं ?1

ख.पहले अंश में पौधे अपने आपको खुशकिस्मत क्यों समझते हैं ?1

ग.दूसरे अंश में पौधे असन्तुष्ट और रूष्ट क्यों है ? और वे स्वयं को बदकिस्मत क्यों समझते हैं ?2

घ.विकास के लिए क्या आवश्यक है ?2

ङ.छोटे पौधों को बौना किसने बना रखा है ?2

अथवा

आज की शाम

जो बाजार जा रहे हैं

उनसे मेरा अनुरोध है

एक छोटा–सा अनुरोध

क्यों न ऐसा हो कि आज शाम

हम अपने थैले और डोलचियाँ

रख दें एक तरफ

और सीधे धान की मंजरियों तक चलें

चावल जरूरी है

जरूरी है आटा दाल नमक पुदीना

पर क्यों न ऐसा हो कि आज शाम

हम सीधे वहीं पहुँचें

एक दम वहीं

जहाँ चावल

दाना बनने से पहले

सुगंध की पीड़ा से छटपटा रहा हो

उचित यही होगा

कि हम शुरू में ही

आमने–सामने

बिना दुभाषिये के

सीधे उस सुगन्ध से

बातचीत करें

यह रक्त के लिए अच्छा है

अच्छा है भूख के लिए

नींद के लिए

कैसा रहे

बाजार न आए बीच में।

 

क.अनुरोधकर्ता किससे अनुरोध कर रहा है ?1

ख.कवि अनुरोधपूर्वक कहाँ जाने को कह रहा है ?1

ग.वहाँ क्या हो रहा है ?2

घ.दुभाषिये का क्या अर्थ है ?2

ङ.कवि बाज़ार से बचने की प्रेरणा क्यों दे रहा है ?2

खण्ड (ख)

प्र.3 निम्नलिखित संकेत बिन्दुओं के आधार पर लगभग 250 शब्दों में निबन्ध लिखिए –10

क.पराधीन को सुख कहाँ

1.पराधीन का अर्थ

2.व्यक्ति का विकास नहीं होता

3.व्यक्ति हीनता का शिकार हो जाता है

4.सुखी नहीं हो सकता

5.प्रति का उदाहरण

ख.समय बहुमूल्य है

1.बीता समय लौटकर नहीं आता

2.सफलता के लिए ठीक समय का चुनाव अपेक्षित

3.एक–एक क्षण का उपयोग सफलता की कंुजी

4.समय का सदुपयोग करने वाले कुछ सफल लोग

5.उपसंहार

ग.आदर्श विद्यार्थी

1.विद्यार्थी का अर्थ

2.जिज्ञासा और श्रद्धा

3.तपस्वी छात्र

4.अनुशासित और नियमित जीवन

5.सादा जीवन उच्च विचार

6.बहुमुखी व्यक्तित्व

घ.मेरा देश महान

1.प्रस्तावना – प्राचीन सभ्य देशों में अग्रगण्य

2.अद्भुत प्राकृतिक सौन्दर्य

3.गौरवशाली इतिहास

4.सभी धमो और संस्कृतियों की भूमि

5.उपसंहार ; अद्भुत है मेरा देश

प्र.4 -जन्मदिन पर बड़ी बहन द्वारा भेजे गये उपहार के लिए उनका आभार प्रकट करते हुए पत्र लिखिए।5

अथवा

विद्यालय के प्रधानाचार्य को पुस्तकालय में विज्ञान–सम्बन्धी पुस्तकें उपलब्ध कराने के लिए पत्र लिखिए।

खण्ड (ग)

प्र.5 वाक्यों में प्रयुक्त क्रिया के भेद लिखिए –

क.बच्चों ने हमें एक भजन सुनाया। 1

ख.दिनेश पुस्तक पढ़ रहा है।1

ग.मैं हँसता हूँ।1

प्र.6 -निदे‍र्शानुसार वाव्य–परिवर्तन कीजिए –

क.हलवाई द्वारा मिठाई बनाई जाती है। (कतृ‍र्वाच्य)-1

ख.लड़की रात भर सो न सकी। (भाववाच्य)-1

ग.हामिद पतंग उड़ा रहा है। (कर्मवाच्य) -1

प्र.7क-निम्नलिखित वाक्यों की पूर्ति अव्यय से कीजिए –

1.––––––– बोलो, बच्चा उठ जायेगा। 1

2.मैं व्यस्त था ––––––––– तुम्हारे घर न आ सका।1

ख.अव्यय छाँटिए और उसका प्रकार बताइये –1

वह तेजी से भागकर घर पहुँचा।

प्र.8-निदे‍र्शानुसार उत्तर दीजिए –

क.जो व्यक्ति गुणी होता है, उसे सभी चाहते हैं। (प्रधान उपवाक्य बताइए) -1

ख.गाना सीखने के लिए परिश्रम करो। (संयुक्त वाक्य बनाइए)-1

ग.मैंने एक दढि़यल देखा। वह भीख माँग रहा था। (मिश्र वाक्य बनाइए)-1

प्र.9क.निम्नलिखित के समस्त पद बनाइये –

1.चार राहों वाला -1

2.नीला कमल-1

ख.'अर्थ' के दो भिन्न अर्थ लिखिये। -1

खण्ड :घ

प्र.10-निम्नलिखित पद्यांश को ध्यान से पढि़ये तथा सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

विकल, विकल, उन्मन थे उन्मन

विश्व के निदाघ के सकल जन

आये अज्ञात दिशा से अनंत के घन!

तप्त धरा, जल से फिर

शीतल कर दो –

बादल गरजो !

क.कवि तथा कविता का नाम लिखो। 2

ख.'तप्त धरा' से कौन–सी पीड़ा व्यक्त हुई है ? 2

ग.कवि बादल से क्या अपेक्षा रखता है ? 2

अथवा

फसल क्या है ?

और तो कुछ नहीं है वह

नदियों के पानी का जादू है वह

हाथों के स्पर्श की महिमा है

भूरी–काली–संदली मिट्टी का गुण–धर्म है।

रूपान्तर है सूरज की किरणों का

सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का !

 

क.पानी के जादू का क्या तात्पर्य है ? 2

ख.सूरज की किरणों का रूपान्तर किसे कहा गया है और कैसे ? 2

ग.हाथों के स्पर्श की महिमा का आशय स्पष्ट कीजिए। 2

प्र.11 -निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए –3,3,3

क.गोपियों ने किन–किन उदाहरणों द्वारा उ(व को उलाहने दिये ?

ख.कवि ने संगतकार को महान क्यों बताया है ?

ग.'आत्मकथा' कविता के आधार पर बताइये कि कवि आत्मकथा क्यों नहीं लिखना चाहता ?

घ.बच्चे की दंतुरित मुसकान देखकर कवि के हृदय पर क्या प्रभाव पड़ता है ?

प्र.12-क--कृष्ण अपने पाँवों और कमर में क्या धारण किये हुए हैं ?1

ख. कवि प्रसाद किस सुख की बात कर रहे हैं ?1

ग.शिशु कवि को क्यों नहीं पहचान पाया ?1

घ.'मन के दुख' से क्या आशय है ?1

ङ.माँ किसे अन्तिम पूँजी समझती है ?1

प्र.13-निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

हालदार साहब को यह सब कुछ बड़ा विचित्र और कौतुक भरा लग रहा था। इन्हीं ख्यालों में खोये–खोये पान के पैसे चुकाकर चश्मे वाले की देशभक्ति के समक्ष नतमस्तक होते हुए वह जीप की तरफ चले, फिर रुके, पीछे मुड़े और पान वाले के पास जाकर पूछा, क्या कैप्टन चश्मे वाला नेताजी का साथी है? या आजाद हिन्द फौज का भूतपूर्व सिपाही ? पान वाला नया पान खा रहा था। पान पकड़े अपने हाथ को मुँह से डेढ़ इंच दूर रोककर उसने हालदार साहब को ध्यान से देखा, फिर अपनी लाल–काली बत्तीसी दिखाई और मुसकराकर बोला – नई साब! वो लँगड़ा क्या जायेगा फौज में। पागल है पागल। वो देखो, वो आ रहा है। आप उसी से बात कर लो! फोटो वोटो छपवा दो उसका कहीं।

 

क.हालदार साहब को कौन–सी बात विचित्र और कौतुकभरी लग रही थी ? 2

ख.पानवाला किस लिए हँस पड़ा ? 2

ग.पानवाले ओर हालदार की सोच का अन्तर स्पष्ट करो। 2

अथवा

अक्सर कहते हैं –  'क्या करें मियाँ, ई काशी छोड़कर कहाँ जाएँ, गंगा मइया यहा, बाबा विश्वनाथ यहाँ, बाला जी का मन्दिर यहाँ, यहाँ हमारे खानदान की कई पुश्तों ने शहनाई बजाई है, हमारे नाना तो वहीं बालाजी मंदिर में बड़े प्रतिष्ठित शहनाईबाज रह चुके हैं। अब हम क्या करें, मरते दम तक न यह शहनाई छूटेगी न काशी। जिस जमीन ने हमें तालीम दी, जहाँ से अदब पाई, वो कहाँ और मिलेगी ? शहनाई और काशी से बढ़कर कोई जन्नत नहीं इस धरती पर हमारे लिए।'

क.बिस्मिल्ला खाँ काशी को छोड़कर क्यों नहीं जाना चाहते ?2

ख.बिस्मिल्ला खाँ को काशी से क्या मिला ? 2

ग.बिस्मिल्ला खाँ हिन्दू–मुस्लिम एकता के प्रतीक थे – सिद्ध कीजिए। 2

प्र.14 -कोई से तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

क.बालगोविन भगत ने अपने बेटे की मृत्यु पर कैसा व्यवहार किया ? 3

ख.फादर कामिल बुल्के हिन्दी प्रेमी थी –  सिद्ध कीजिए। 3

ग.'संस्कृति' निबन्ध में हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति' को बला क्यों कहा गया है ?3

घ.'एक कहानी यह भी' के आधार पर  बताइये  कि  लेखिका  के  व्यक्तित्व  को  किस – किसने प्रभावित किया ?3

प्र.15.क.'नेताजी का चश्मा' क्या सन्देश देता है ?2

ख.'नौबतखाने में इबादत' के आधार पर बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिये। 3

प्र-16-निमनलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

क- जार्ज पंचम की नाक्लगने वाली खबर के दिन अखबार चुप क्यों थे ? 2

ख- विदेशी वस्त्रों का संग्रह करने वाले कार्यकर्ता किस बात से हैरान थे ? 2

ग- 'मैं क्यों लिखता हूँ' के आधार पर बताइए कि लेखक किन बाहरी दबावों के कारण     लेखन करता है ? 2

घ- रात्रि में गंगतोक के सौन्दर्य का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए । 2

प्र-17-दुलारी और टुन्नू के प्रेम के पीछे उनका कलाकार मन था ।यह प्रेम दुलारी को देश प्रेम की ओर कैसे प्रेरित करता है ? 4

अथवा

'साना साना हाथ जोड़' के आधार पर बताइए कि प्रकृति ने जलसण्चय की व्यवस्था किस प्रकार की है ? 4

 

                     -प्रस्तुति :-

अशोक कुमार वार्ष्णेय

 

Sunday, June 29, 2008

फीचर लेखन


फीचर लेखन

बलदेव राज कालड़ा
सह निदेशक

समाचार–लेखन तथा संपादन पत्रकारिता के दो आधार हैं। समाचार–लेखन से जुड़ी एक अन्य विद्या है फीचर। फीचर जहाँ आधुनिक पत्रकारिता की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विधा है, वहीं साहित्य की भी नव–विकसित विधा बन चुकी है।
फीचर क्या है ? फीचर ऐसा रचनात्मक तथा कुछ–कुछ स्वानुभूति लेख है, जिसका गठन किसी घटना, स्थिति अथवा जीवन के किसी पक्ष के सम्बन्ध में पाठक का मूलत: मनोरंजन करने एवं सूचना देने के उद्देश्य से किया गया हो। (डेनियल आर विलियमसन, फीचर राइटिंग फार न्यूज पेपर्स) दरअसल यह अभिव्यक्ति का ऐसा रूप है जिसमें ज्ञान, कल्पना, यथार्थ, घटनाओं, चमत्कार, कौतूहल, समस्या आदि सभी कुछ भावना–प्रधान एवं रसमय गद्य बना हुआ रहता है दृश्यात्मकता इसका आवश्यक गुण है।
फीचर के लक्षण तथा स्वरूप – फीचर स्थिति का विहंगावलोकन ही नहीं करता, वह प्रश्नों का उत्तर भी देता है और अज्ञात का ज्ञान भी कराता है। फीचर मानो किसी घटना की दूरबीन से जाँच करता है। अच्छे फीचर के गुणों की जब बात करते हैं, तो उसके मूल चार आधारों पर हमारा ध्यान जाना आवश्यक है ये हैं जिज्ञासा, सत्यता, मानवीय भावना, चित्रात्मकता, स्पष्ट विश्लेषण।
डा. रामचन्द्र तिवारी ने कहा है कि फीचर लेखक अपने आँख–कान, भावों, अनुभूतियों, मनोवेगों और अन्वेषणों का सहारा लेकर उसे रुचिकर, आकर्षक और हृदयग्राही बनाता है (सम्पादन के सिद्धान्त, पृष्ठ 105)
फीचर के प्रकार – श्री विवेकी राय कहते हैं कि फीचर का वृत्त इतना विशाल है, जीवन की ही भांति वह इतना व्यापक है कि उसमें समस्त विषयों का समावेश हो जाता है।
विषयों की विविधता और उसके विस्तार की दृष्टि से फीचर का वर्गीकरण करें, तो कुछ निम्नलिखित प्रकार के वर्ग निर्धारित किए जा सकते हैं –
1.विशिष्ट घटना – जैसे – युद्ध अकाल, दुर्घटना, दंगा, आन्दोलन आधारित फीचर।
2.राजनीतिक घटनाओं पर आधारित फीचर।
3.सामाजिक समस्याओं को उजागर करने वाले फीचर।
4.वाद–विचार सम्बन्धी चिन्तनात्मक फीचर।
5.आंचलिक फीचर।
6.व्यक्ति विशेष के फीचर।
7.समाचाराधारित फीचर।
8.मेला, मनोरंजन, सभा, यात्रा सम्बन्धी – सांस्कृतिक फीचर।
9.महत्त्वपूर्ण साहित्यिक प्रकाशन आदि फीचर।
10.(सोद्देश्य फीचर )खोजपरक फीचर।
फीचर की रचना प्रक्रिया– फीचर लेखन प्रक्रिया का पहला बिन्दु तो है विषय चयन। फीचर का विषय ऐसा होना चाहिए जो लोक – रूचि का हो, लोक–मानस को छुए, पाठकों
में जिज्ञासा जगाए और कोई नई जानकारी दे। सामान्य से सामान्य विषय को चुना जा सकता है लेकिन लेखक को चाहिए कि वह उसे इस कोण से देखे कि इस विषय की उपयोगिता क्या है, पाठक उसे क्यों पढ़ेगा, इसका समसामयिक महत्व क्या है, इसमें क्या नया है या दिखाया जा सकता है।पत्र–पत्रिका के पाठक किस वर्ग के हैं? किस रुचि के हैं ?
रचना प्रक्रिया का दूसरा बिन्दु है – सामग्री संकलन। इसके लिए लेखक को विषयवस्तु के निकट जाना होता है। घटना स्थल, पर्यटन स्थल, मेला स्थल, रीति–रिवाज, रहन–सहन, वस्त्राभूषण आदि के अध्ययन के लिए उस समाज या स्थान विशेष पूरी तैयारी के साथ जाना होता है। फीचर लेखन के लिए रचना–प्रक्रिया के क्रम में जिन बातों से सुविधा हो सकती है –
1.आरम्भ – फीचर का आरम्भ प्राय: एक खाका बनाकर करना चाहिए –
(अ).किसी आकर्षक उद्धरण, काव्य पंक्तियों, किसी प्रश्न शृंृखला, दृष्टांत आदि से फीचर का आरम्भ किया जाए तो वह अच्छा बन सकताहै।
(ब).व्यक्ति के रेखाचित्र, परिचय, प्राकृतिक दृश्य, घटनांश, सम्बोधन से भी आरम्भ किया जा सकता है।
2.मध्य – मध्य में मूल विषय का उद्घाटन करना चाहिए। फीचर के लिए तो विश्वसनीयता सर्वप्रथम अनिवार्य है। सत्य को किस तरह हम सामने ला रहे हैं यह देखना जरूरी है। फीचर का मध्य भाग संतुलित, विवेचना और विश्लेषण से युक्त होना चाहिए। श्री डी. एस. मेहता कहते हैं कि फीचर में उस तथ्य को उभारा जाता है, जो महत्त्व का होते हुए भी स्पष्ट नहीं होता उसका प्रस्तुतीकरण ही फीचर के व्यक्तित्व, उसकी शक्ति और उसके औचित्य का बोध देता है। अध्ययन, अनुसंधान और साक्षात्कारों के बल पर फीचर में तथ्यों का विस्तार किया जाता है।
3.अन्त – किसी भी फीचर का अंतिम भाग एक तरह से सारांश होता है। यह आवश्यक नहीं कि लेखक निष्कर्ष गिनाए। वह नए विचार सूत्र दे सकता है जो पाठकों को सोचने को बाध्य करे।
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डा. हरिकृष्ण देवसरे और श्रीमती विभा देवसरे का सम्बोधन




केन्द्रीय विद्यालय के प्रशिक्षण शिविर में डॉ. देवसरे...

केन्द्रीय विद्यालय के स्नातकोत्तर हिंदी शिक्षकों के सेवा कालीन प्रशिक्षण शिविर (केन्द्रीय विद्यालय न02 आगरा) में डा. हरिकृष्ण देवसरे और श्रीमती विभा देवसरे का आना हम सभी के लिए एक अभूतपूर्व अनुभव रहा. डॉ. देवसरे उन विरले साहित्यकारों में से हैं जो समाज के प्रति गहरे दायित्व बोध को समझते हैं और विशेषकर बालसाहित्य के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय रहकर ,एक नवीन पीढी के उत्थान के लिए प्रतिबद्ध हैं.
'बालसाहित्य है क्या ?' इस मूलभूत प्रश्न को उठाकर डॉ. देवसरे जी ने अपना उदबोधन आरम्भ किया.उन्होंने कहा कि हम जो लिखें,ज़रूरी नहीं कि बच्चे वही पढ़ें, वास्तव में बच्चे स्वयं जिसे अपनी रूचि के आधार पर पढ़ने के लिए स्वीकार कर लें वही बालसाहित्य है.आज के बच्चे जागरूक हैं और हम उन्हें कुछ भी पढ़ने के लिए बाध्य नहीं कर सकते .ऐसे में साहित्यकार का उत्तरदायित्व और बढ़ जाता है .आज के लेखकों और प्रकाशकों को बच्चों की रूचि और परिवेश को ध्यान में रखकर नए आकर्षक और आधुनिक कलेवर की पत्रिकाएँ निकालनी चाहिए.आज बच्चों को परियों के कल्पनालोक में और राजा-रानी की कपोल कथाओं में बहलाना व्यर्थ है ,ये बच्चे सूचना प्रौद्योगिकी के संपर्क में रहते हैं ,इन्हें अन्तरिक्ष की ऊंचाइयाँ और अतल की गहराइयाँ आकर्षित करती हैं .अतः उनको मिलने वाला साहित्य भी आधुनिकता -बोध और वैज्ञानिकता पर आधारित होना चाहिए.

आज के अभिभावकों को सचेत करते हुए उन्होंने कहा कि यदि आप अपने बच्चे को भारतीय इतिहास,संस्कृति और साहित्य से जोड़े रखना चाहते हैं तो आपको उन्हें पाठेतर बालसाहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए . पुराण ,रामायण,महाभारत आदि की कथाएँ भी छोटे-छोटे रोचक प्रसंग लेकर उन्हें पढाई जा सकती हैं. बालसाहित्य या अन्य पाठेतर किताबें लेना धन का अपव्यय नहीं है बल्कि हमें त्यौहार और जन्मदिन जैसे अवसरों पर अन्य उपहारों के साथ पुस्तकें भी उत्साह से खरीदकर देनी चाहिए .पुणे में हुए एक अधिवेशन की कार्यशाला का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि मराठी के बड़े लेखक बच्चों के एक समूह को अपनी किताबें पढ़ने के लिए देते थे ,फिर उन बच्चों से पुस्तक समीक्षा करवाई जाती.बच्चों की प्रतिक्रियाएँ वास्तव में अद्भुत और अभूतपूर्व होती थीं जिसमें वे बड़े से बड़े लेखक की धज्जियाँ उड़ा देते थे.इस तरह की कार्यशालाएँ आयोजित कर या प्रभात फेरी और मटकी में किताबें भरकर उन्हें फोड़ने की प्रतियोगिता आयोजित कर के बच्चों का रुझान किताबों की ओर बढ़ाया जा सकता है.
आज के व्यस्त जीवन में अभिवावक स्वयं तो बच्चों के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं परतु उनसे नैतिक ओर संस्कारवान होने की अपेक्षा करते हैं .यह कैसे संभव है ?हमें अपने उत्तरदायित्वों को समझाना होगा,कोरी नैतिकता का पाठ पढ़ाने से पहले बच्चे को आज के हिंसात्मक -ईर्ष्या-द्वेष के माहौल से परिचित करना होगा.उसे बताएँ कि नैतिक ये है और अनैतिक ये,सच ये है और झूठ ये है-फिर समय ,परिस्थिति और विवेक के आधार पर वे जो ठीक समझें करें . आज के बच्चों को आपकी पीठ की चिकनाहट नहीं चाहिए ,उन्हें खुरदुरे यथार्थ से रूबरू होने दें .
अंत में आज के बालसाहित्यकारों को सचेत करते हुए वे बोले कि आज जब सूचना प्रौद्योगिकी इतनी तेजी से प्रगति कर रही है,हमारी चुनौतियाँ और बढ़ जाती हैं .हमें अपनी पुस्तकों और पत्रिकाओं के कलेवर को इतना आधुनिक और इतना आकर्षक बनाना होगा कि वे कंप्यूटर और टेलिविज़न का विकल्प बन सकें.
डा.देवसरे के अभिभाषण को पूरा करते हुए श्रीमती देवसरे ने भी अंत में शिक्षकों को संबोधित करते हुए कहा कि आप संवेदनशील विद्वज्जन हैं अतः आप साहित्य के माध्यम से बच्चे के जीवन को सुधार सकते हैं .महिलाओं के दायित्व पर विशेष बल देते हुए उन्होंने कहा कि आपकी क्षमताओ को पुरुष वर्ग नहीं संभाल सकता है.अतः बच्चे के भीतरी मन के संसार को आप ही संवार सकती हैं ,उसे खोने मत दीजिये ,वही कल का भविष्य हैं.साहित्य मन को अच्छी तरह खंगालता है ,हमें उसके सहयोग से देश के भावी निर्माताओं का निर्माण करना है.
इस सारगर्भित उदबोधन के उपरांत शिविर निदेशक श्री रामेश्वर दयाल काम्बोज ने वक्ताओं का धन्यवाद ज्ञापित कर आभार व्यक्त किया.
•
डा.ऋतु पल्लवी

Saturday, June 28, 2008

युवा मन की उड़ान


युवा मन की उड़ान:किरण सूद

प्रकाशक:राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, जी–17, जगतपुरी, दिल्ली – 110051

    पृष्ठ संख्या:215 पृष्ठ ; मूल्य:95/– रू पहला संस्करण–2003

 

    प्रस्तुत पुस्तक खिलते यौवन के नाम समर्पित की गई है, जिसमें विकास एवं अभ्युत्थान की अनंत संभावनाएँ हैं। लेखिका ने जहाँ एक ओर अपने गहन अनुभव से जीवन यात्रा में संघर्षरत अनेक सफल युवक–युवतियों के उदाहरण देते हुए सफलता के आधारभूत तत्वों का सटीक एवं व्यावहारिक विवेचन प्रस्तुत किया है, वहीं दूसरी ओर दिग्भ्रमित एवं निराश युवा दिलों में आशा और उत्साह की नई उमंग जाग्रत करने का स्तुत्य प्रयास किया है।

वर्तमान प्रतिस्पर्धा के युग को दृष्टिगत रखते हुए पुस्तक को नौ अध्यायों में विभक्त कर विवेच्य विषय को सरल एवं प्रेरक शब्दों द्वारा बोधगभ्य बनाया गया है। प्रथम अध्याय 'जीवन लक्ष्य और महत्वाकांक्षा' के अंतर्गत मानव–जीवन की महत्ता, महत्त्वाकांक्षा का औचित्य, आत्मविश्वास एवं सकारात्मक पक्ष, महत्वाकांक्षा को निर्धारित करने वाले तत्व एवं असफलता से हार न मानने के उपायों का विशद वर्णन किया गया है।

सुदृढ़ इच्छा शक्ति से अपने भाग्य को बदला जा सकता है, यह सिद्ध किया है– हस्तरेखा विशेषज्ञ कीरो ने। यौवन निराशा या आत्मदाह का समय नहीं है। यह समय है– अपने जीवन का लक्ष्य

निर्धारित करने का एवं उसके अनुसार प्रयास करने का। साधारण योग्यता होने पर भी कोई उन्नति के शिखर पर पहुँच सकता है। बशर्ते कि वह परिश्रमी एवं धैर्यवान हो। महत्वाकांक्षा जीवन के लिए सही मायने में टॉनिक है।

दूसरा अध्याय 'प्रभावी व्यक्तित्व का रहस्य' अपने कलेवर में निम्नलिखित बिन्दुओं को समेटे हुए है – व्यक्तित्व विकास आधुनिकता की देन, व्यक्तित्व के मुख्य गुणाधार, साक्षात्कार का महत्व, आत्म प्रस्तुति की कला, शारीरिक सौष्ठव एवं स्वास्थ्य, वेशभूषा का चयन, वार्तालाप की कला, शिष्टाचार  एवं सुसंस्कृत व्यवहार, अभिव्यक्ति का माध्यम–आँखें, भय का निराकरण, सकारात्मक रूख, क्रोध पर नियंत्रण, स्थिरता एवं सक्रियता, निजी सफाई, व्यक्तिगत आदतों में सुधार, सही निर्णय की क्षमता, ईमानदारी एवं प्रतिबद्धता, तत्परता एवं समय पर काम करने की प्रवृत्ति, जोखिम उठाना एवं साहसी होना, कार्य–क्षमता बढ़ाने के प्रयास, उत्साह एवं मौलिकता, सहयोग एवं सौहार्द्र।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह सर्वमान्य तथ्य है कि आज सफलता एवं समृ्द्धि का मूल तत्व है– व्यक्तित्व। यदि आप मंत्री, उच्चाधिकारी, कुशल प्रशासक या धनी व्यवसायी बनना चाहते हैं तो इसके लिए जरूरी है – आपके व्यक्तित्व का मूल्यांकन। सफल व्यक्तियों के जीवन का रहस्य है – उनका व्यवहार कुशल होना। सफलता के लिए बु​द्धि से भी अधिक आवश्यक है तुरंत सक्रिय होना और समय पर काम करना। सभी सफल व्यक्तियों में चाहे वह गाँधी हों या मंडेला मार्क्स हों या माओ, बुद्ध हों या ईसा–साहस का गुण अंतर्निहित है।

तीसरा अध्याय 'सम्प्रेषण एवं संवाद कला' अभिव्यक्ति का उकृष्ट नमूना है। मनुष्य की सफलता के लिए जरूरी है – सम्प्रेषण प्रक्रिया। शाब्दिक संप्रेषण के लिए अति आवश्यक है – स्पष्ट वाणी, संतुलित स्वर एवं भाषा का द्विपक्षीय ज्ञान। संवादकला का गु्रुमंत्र है : 'कम बोलें, जो कुछ भी कहें, और जहाँ तक हो सके, सदैव सच बोलें।' याद रहे, मौन ही आभूषण है – सफल एवं गरिमामय व्यक्तित्व का।

चतुर्थ अध्याय 'दिशाबोध एवं एकाग्रता' लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में मील का पत्थर है। इस अध्याय में यौवन : ऊर्जा का स्रोोत, यौवन का दुविधा, स्वयं को जानें, दिशा–भ्रम, दिशा–निर्देश हेतु सलाह–केन्द्र, आत्म–विश्लेषण, आत्मप्रस्तुति की कला व आत्म–परिचय, शिक्षणेतर योग्यता, व्यावसायिक योग्यता, व्यक्तिगत रुचि, मानवीय गुण, संतोष प्रगति में बाधक न बने, दिशा–बोध में सहायक : अन्तरात्मा की आवाज, भेड़चाल से बचें, सफलता के लिये एकाग्रता, विकास का अनवरत क्रम, धन साधन है, साध्य नहीं, जोखिम उठाने का साहस नामक विषयों पर  प्रकाश डाला है।

 

सफलता एवं समृ​द्धि का रहस्य है अपनी क्षमता का सही ज्ञान एवं परिश्रम की प्रवृत्ति तथा जोखिम उठाने का साहस। अपनी दिशा को जानने समझने वाला व्यक्ति न असफलता से भयभीत होता है और न ही सफलता मिलने पर आराम से आँखें मूँद कर बैठ जाता है।

पाँचवाँ अध्याय 'समय–बोध एवं समय प्रबंधन समय के महत्त्व की अनूठी मिसाल है। इस अध्याय में समय का मूल्य पहचानें, समय पर्याप्त है, समय : सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संसाधन, समय की पाबंदी, समय के पाबंद कैसे बने? समय का सर्वोत्तम उपयोग, समय–प्रबंधन की कला, अंतिम तिथि का निर्धारण, समय–सूची एवं कार्य–वर्गीकरण का गंभीर विवेचन है। समय सर्वाधिक महत्वपूर्ण संसाधन है। एक पल भी व्यर्थ गँवाने का अर्थ है– सफलता के मार्ग से डिगना। प्रसिद्ध लेखक एवं इतिहासवेत्ता श्री भगवतशरण उपाध्याय अपनी समय–पाबंदी के कारण सर्वत्र सराहे जाते थे।'

छठा अध्याय 'सकारात्मक सोच एवं आत्मविश्वास' सफलता प्राप्ति की दिशा को प्रशस्त करता है। इस अध्याय की विषय वस्तु में निम्नलिखित तत्त्वों का निरूपण किया गया है – विचार की शक्ति, विकृति से कैसे बचें? नकारात्मक बातें न करें, शब्द ही शक्ति है, सकारात्मक से संपर्क करें, नकारात्मक को सकारात्मक में कैसे बदले? सकारात्मकता एवं सफलता, निराधार भय से बचें, सकारात्मक सोच की ओर कैसे बढ़ें ? आत्मविश्वास का बीज : स्वावलंबन, निरंतर आगे बढ़े, आत्मविश्वास: व्यक्तित्व का आधारस्तंभ।

                            

आत्म विश्वास के लिए जरूरी है – स्वावलंबी होना, आत्मबल के लिए जरूरी है– अपने प्रति ईमानदारी, सकारात्मक सोच के लिए जरूरी है – आत्मबल को पहचानना। कोई भी काम हो – प्रबंधन, निर्देशन, अध्यापन, वकालत या लेखन, सभी कार्य क्षेत्र में सबसे पहले जिस गुण की आवश्यकता है वह है – आत्मविश्वास।

सातवाँ अध्याय 'निराशा एवं कुंठा से बचाव' सार्थक जीवन जीने की कला को मुखरित करता है। इस अध्याय में सहनशक्ति का अभव, तार्किक सोच का अभाव, परिवार एवं संबंध, यथार्थ का सामना करें, जीवन सुंदर है, विकल्प की खोज, सार्थक जीवन कैसे जिएँ ? पेड़ से मैत्री करें, दैनंदिनी (डायरी) लिखें, संवाद एवं सलाह परामर्श करें, कुंठा से बचें, वस्तु स्थिति को समझें और स्वीकार करें, व्यक्तित्व की पूर्णता समझें जैसे तत्वों का समावेश है। जीने की कला का अर्थ है – जो कुछ भी आपके पास है, उसका सर्वोत्तम लाभ लें और जो कुछ नहीं है, उस अभीष्ट को पाने का प्रयास करें।

आठवाँ अध्याय 'आकर्षण, प्रेम एवं आत्म नियंत्रण' संतुलित व्यवहार की शिक्षा देता है। पीढि़यों का अंतराल, बुराई से कैसे बचें ?, आकर्षण: सृजन का मूलाधार, गलत और सही की ऊहापोह, दोस्ती दबाव में न करें, मित्रता, आकर्षण एवं प्रेम, प्रेम पावन एवं प्रेरक भाव है, प्रेम एवं शारीरिक संबंध, आत्मनियंत्रण एवं संतुलन, शिष्टाचार एवं संतुलन, शिष्टाचार के आवश्यक अंग, संतुलित व्यवहार का रहस्य: सहनशक्ति, धन–व्यय और संतुलन, धन व्यय करते हुए संतुलन कैसे बनाएँ ? धन एवं प्रेम का संबंध जैसे विषय इस अध्याय में समाविष्ट किए गए हैं।

याद रहे – सर्वोत्तम मित्र है – पुस्तक। अपने साथ सदैव अच्छी पुस्तकें लेकर चलें। खाली वक्त हो तो पुस्तक पढ़ें और पुस्तक पढ़ने के लिए वक्त निकालें।

नवाँ अध्याय 'यथार्थ का सामना' युवकों को जीवन की वास्तविकता से साक्षात्कार कराने में सक्षम है। प्रस्तुत अध्याय में सच का सामना, नशीले पदाथो को कैसे छोड़ें ? सदाचार का महत्व, अपराध जगत से बचें, यथार्थ को पहचानें, यथार्थ का सामना करें जैसे ज्वलंत पक्षों का सारगर्भित विवेचन है। निश्चय ही प्रस्तुत पुस्तक प्रत्येक युवक द्वारा पठनीय एवं संग्रहणीय है।

-कैलाश चन्द्र शर्मा

राजपत्रित अध्यापक

राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूल अजमेर 305001